अग्निभयं च चतुर्थे भयमाग्नेये च भवति चौरेभ्यः । कोणादपि द्वितीये धनक्षयो नृपसुतविनाशः ॥
यदि पूर्व दिशा के चतुर्थ भाग (अग्निकोण) में स्थित दीप्त शकुन हो तो अग्नि और चोरों का भय होता है। अग्निकोण से द्वितीय भाग में स्थित दीप्त शकुन हसे हो धनक्षय और राजपुत्र का नारा होता है।
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