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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 36
तदनन्तरे परिव्राट् श्रवणभयं तत्परे त्वनशनभयम्। वृष्टिभयं वारुण्ये छतस्कराणां भयं परतः ॥
यदि पश्चिम दिशा के द्वितीय भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो तपस्वी और बौद्ध संन्यासी का भय, तृतीय भार में स्थित हो तो उपवास का भय, ठीक पश्चिम में स्थित हो तो वृष्टि का भय तथा पसे भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो कुत्ते और चोरों का भम होता है।
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