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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 34
धीवरशाकुनिकानां सप्तमभागाद् भयं भवति दीप्ते । भोजनविघात उक्तो निर्ग्रन्थभयं च तत्परतः ॥
यदि आग्नेय कोण से सप्तम भाग में स्थित दीपा शकुन हो तो धीवर और पंक्षी मारने वालों का भय होता है। आग्नेय कोण से आष्टम भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो भोजन का नाश और नग्न संन्यासी का भय होता है।
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