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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 5
कोणाच्चतुर्थखण्डे लब्धिर्द्रव्यस्य पूर्वनष्टस्य । यद्वा तद्वा फलमपि यात्रायां प्राप्नुयाद्याता ॥
आग्नेय कोण से चतुर्थ भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो पूर्व में नष्ट द्रव्य का लाभ होता है। गमन करने वाला गमनकाल में जो कुछ फल होता है, उसको जिस- किसी भी प्रकार से प्राप्त करता है।
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