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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 29
शान्तासु दिक्षु फलमिदमुक्तं दीप्तास्वतोऽ भिधास्यामि । ऐन्द्रयां भयं नरेन्द्रात् समागमचैव शत्रूणाम् ॥
ये पूर्वकथित समस्त फल खान्त दिशाओं के कहे गये है। अब दीप्त दिशाओं के फल कहता हूँ। यदि दोप्न पूर्व दिशा में स्थित शकुन हो तो राजा का भय और शत्रुओं के साथ समागम होता है।
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