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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 24
भारवहतक्षभिक्षुकसन्दर्शनमपि च वायुदिक्संस्थे । तिलककुसुमस्य लब्धिः सनागपुत्रागकुसुमस्य ॥
यदि वायव्य कोण के अर में स्थित शकुन हो तो भार ढ़ोने वाले, बढ़ई और भिक्षुक का दर्शन तथा तिलक, नाग, पुत्राग- इसके फूलों का लाभ होता है।
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