भारवहतक्षभिक्षुकसन्दर्शनमपि च वायुदिक्संस्थे । तिलककुसुमस्य लब्धिः सनागपुत्रागकुसुमस्य ॥
यदि वायव्य कोण के अर में स्थित शकुन हो तो भार ढ़ोने वाले, बढ़ई और भिक्षुक का दर्शन तथा तिलक, नाग, पुत्राग- इसके फूलों का लाभ होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।