Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 1 — षड्जगीता
षड्जगीता
49 श्लोक • केवल अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे जनमेजय! यह कहकर जब भीष्मजी चुप हो गये, तब राजा युधिष्ठिर ने घर जाकर अपने चारों भाइयों तथा पाँचवें विदुरजी से प्रश्न किया।
लोगों की प्रवृत्ति प्रायः धर्म, अर्थ और काम की ओर होती है। इन तीनों में कौन सबसे श्रेष्ठ, कौन मध्यम और कौन लघु है?
इन तीनों पर विजय पाने के लिये विशेषत: किस में मन लगाना चाहिये? आप सब लोग हर्ष और उत्साह के साथ इस प्रश्न का यथावतरूप से उत्तर दें और वही बात कहें, जिस पर आपकी पूरी आस्था हो।
तब अर्थ की गति और तत्त्व को जानने वाले प्रतिभाशाली विदुरजी ने धर्मशास्त्र का स्मरण करके सबसे पहले कहना आरम्भ किया।
विदुरजी बोले - राजन्! बहुत-से शास्त्रों का अनुशीलन, तपस्या, त्याग, श्रद्धा, यज्ञकर्म, क्षमा, भावशुद्धि, दया, सत्य और संयम - ये सब आत्मा की सम्पत्ति हैं।
युधिष्ठिर! तुम इन्हीं को प्राप्त करो। इनकी ओर से तुम्हारा मन विचलित नहीं होना चाहिये। धर्म और अर्थ की जड़ ये ही हैं। मेरे मत में ये ही परम पद हैं।
धर्म से ही ऋषियों ने संसार-समुद्र को पार किया है। धर्म पर ही सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं। धर्म से ही देवताओं की उन्नति हुई है और धर्म में ही अर्थ की भी स्थिति है।
राजन! धर्म ही श्रेष्ठ गुण है, अर्थ को मध्यम बताया जाता है और काम सबकी अपेक्षा लघु है; ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं। अतः मन को वश में करके धर्म को अपना प्रधान ध्येय बनाना चाहिये और सम्पूर्ण प्राणियों के साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिये, जैसा हम अपने लिये चाहते हैं।
वैजश्ञम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! विदुरजी की बात समाप्त होने पर धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले अर्थशास्त्रविशारद अर्जुन ने युधिष्ठि की आज्ञा पाकर कहा।
अर्जुन बोले - राजन्! यह कर्मभूमि है। यहाँ जीविका के साधनभूत कर्मो की ही प्रशंसा होती है। खेती, व्यापार, गोपालन तथा भाँति-भाँति के शिल्प - ये सब अर्थप्राप्ति के साधन हैं।
अर्थ ही समस्त कर्मों की मर्यादा के पालन में सहायक है। अर्थ के बिना धर्म और काम भी सिद्ध नहीं होते, ऐसा श्रुति का कथन है।
धनवान मनुष्य धन के द्वारा उत्तम धर्म का पालन और अजितेन्द्रिय पुरुषों के लिये दुर्लभ कामनाओं की प्राप्ति कर सकता है।
श्रुति का कथन है कि धर्म और काम अर्थ के ही दो अवयव हैं। अर्थ की सिद्धि से उन दोनों की भी सिद्धि हो जायगी।
जैसे सब प्राणी सदा ब्रह्माजी की उपासना करते हैं, उसी प्रकार उत्तम जाति के मनुष्य भी सदा धनवान् पुरुष की उपासना किया करते हैं।
जटा और मृगचर्म धारण करने वाले जितेन्द्रिय संयतचित्त शरीर में पंक धारण किये मुण्डितमस्तक नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी अर्थ की अभिलाषा रखकर पृथक्-पृथक् निवास करते हैं।
सब प्रकार के संग्रह से रहित, संकोचशील, शान्त, गेरुआ वस्त्रधारी, दाढ़ी-मूँछ बढ़ाये विद्वान् पुरुष भी धन की अभिलाषा करते देखे गये हैं।
कुछ दूसरे प्रकार के ऐसे लोग हैं, जो स्वर्ग पाने की इच्छा रखते हैं और कुलपरम्परागत नियमों का पालन करते हुए अपने-अपने वर्ण तथा आश्रम के धर्मो का अनुष्ठान कर रहे हैं; किंतु वे भी धन की इच्छा रखते हैं।
दूसरे बहुत-से आस्तिक-नास्तिक संयम-नियमपरायण पुरुष हैं, जो अर्थ के इच्छुक होते हैं। अर्थ की प्रधानता को न जानना तमोमय अज्ञान है। अर्थ की प्रधानता का ज्ञान प्रकाशमय है।
धनवान् वही है, जो अपने भृत्यों को उत्तम भोग और शत्रुओं को दण्ड देकर उनको वश में रखता है। बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाराज! मुझे तो यही मत ठीक जँचता है। अब आप इन दोनों की बात सुनिये। इनकी वाणी कण्ठ तक आ गयी है अर्थात् ये दोनों भाई बोलने के लिये उतावले हो रहे हैं।
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर धर्म और अर्थ के ज्ञान में कुशल माद्रीकुमार नकुल और सहदेव ने अपनी उत्तम बात इस प्रकार उपस्थित की।
नकुल-सहदेव बोले - महाराज! मनुष्य को बैठते, सोते, घूमते-फिरते अथवा खड़े होते समय भी छोटे-बड़े हर तरह के उपायों से धन की आय को सुदृढ़ बनाना चाहिये।
धन अत्यन्त प्रिय और दुर्लभ वस्तु है। इसकी प्राप्ति अथवा सिद्धि हो जाने पर मनुष्य संसार में अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण कर सकता है, इसका सभी को प्रत्यक्ष अनुभव है - इसमें संशय नहीं है।
जो धन धर्म से युक्त हो और जो धर्म धन से सम्पन्न हो, वह निश्चितरूप से आपके लिये अमृत के समान होगा, यह हम दोनों का मत है।
निर्धन मनुष्य की कामना पूर्ण नहीं होती और धर्महीन मनुष्य को धन भी कैसे मिल सकता है। जो पुरुष धर्मयुक्त अर्थ से वंचित है, उससे सब लोग उद्दिग्न रहते हैं।
इसलिये मनुष्य अपने मन को संयम में रखकर जीवन में धर्म को प्रधानता देते हुए पहले धर्माचरण करके ही फिर धन का साधन करे; क्योंकि धर्मपरायण पुरुष पर ही समस्त प्राणियों का विश्वास होता है और जब सभी प्राणी विश्वास करने लगते हैं, तब मनुष्य का सारा काम स्वतः सिद्ध हो जाता है।
अत: सबसे पहले धर्म का आचरण करे; फिर धर्मयुक्त धन का संग्रह करे। इसके बाद दोनों की अनुकूलता रखते हुए काम का सेवन करे। इस प्रकार त्रिवर्ग का संग्रह करने से मनुष्य सफलमनोरथ हो जाता है।
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इतना कहकर नकुल और सहदेव चुप हो गये। तब भीमसेन ने इस तरह कहना आरम्भ किया।
भीमसेन बोले - धर्मराज! जिसके मन में कोई कामना नहीं है, उसे न तो धन कमाने की इच्छा होती है और न धर्म करने की ही। कामनाहीन पुरुष तो काम (भोग) भी नहीं चाहता है; इसलिये त्रिवर्ग में काम ही सबसे बढ़कर है।
किसी-न-किसी कामना से संयुक्त होकर ही ऋषिलोग तपस्या में मन लगाते हैं। फल, मूल और पत्ते चबाकर रहते हैं। वायु पीकर मन और इन्द्रियों का संयम करते हैं।
कामना से ही लोग वेद और उपवेदों का स्वाध्याय करते तथा उसमें पारंगत विद्वान् हो जाते हैं। कामना से ही श्राद्धकर्म, यज्ञकर्म, दान और प्रतिग्रह में लोगों की प्रवृत्ति होती है।
व्यापारी, किसान, ग्वाले, कारीगर और शिल्पी तथा देव-सम्बन्धी कार्य करने वाले लोग भी कामना से ही अपने-अपने कर्मो में लगे रहते हैं।
कामना से युक्त हुए दूसरे मनुष्य समुद्र में भी घुस जाते हैं। कामना के विविध रूप हैं तथा सारा कार्य ही कामना से व्याप्त है।
महाराज! सभी प्राणी कामना रखते हैं। उससे भिन्न कामनारहित प्राणी न कहीं है, न कभी था और न भविष्य में होगा ही; अतः यह काम ही त्रिवर्ग का सार है। धर्म और अर्थ भी इसी में स्थित हैं।
जैसे दही का सार माखन है, उसी प्रकार धर्म और अर्थ का सार काम है। जैसे खली से श्रेष्ठ तेल है, तक्र से श्रेष्ठ घी है और वृक्ष के काष्ठ से श्रेष्ठ उसका फूल और फल है, उसी प्रकार धर्म और अर्थ दोनों से श्रेष्ठ काम है।
जैसे फूल से उसका मधु-तुल्य रस श्रेष्ठ है, उसी प्रकार धर्म और अर्थ से काम श्रेष्ठ माना गया है। काम धर्म और अर्थ का कारण है, अत: वह धर्म और अर्थरूप है।
बिना किसी कामना के ब्राह्मण अच्छे अन्न का भी भोजन नहीं करते और बिना कामना के कोई ब्राह्मणों को धन का दान नहीं करते हैं। जगत् के प्राणियों की जो नाना प्रकार की चेष्टा होती है, वह बिना कामना के नहीं होती; अतः त्रिवर्ग में काम का ही प्रथम एवं प्रधान स्थान देखा गया है।
अतः राजन्! आप काम का अवलम्बन करके सुन्दर वेषवाली, आभूषणों से विभूषित तथा देखने में मनोहर एवं मदमत्त युवतियों के साथ विहार कीजिये। हम लोगों को इस जगतू में काम को ही श्रेष्ठ मानना चाहिये।
धर्मपुत्र! मैंने गहराई में पैठकर ऐसा निश्चय किया है। मेरे इस कथन में आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरा यह वचन उत्तम, कोमल, श्रेष्ठ, तुच्छतारहित एवं सारभूत है; अतः श्रेष्ठ पुरुष भी इसे स्वीकार कर सकते हैं।
मेरे विचार से धर्म, अर्थ और काम तीनों का एक साथ ही सेवन करना चाहिये। जो इनमें से एक का ही भक्त है, वह मनुष्य अधम है, जो दो के सेवन में निपुण है, उसे मध्यम श्रेणी का बताया गया है और जो त्रिवर्ग में समानरूप से अनुरक्त है, वह मनुष्य उत्तम है।
बुद्धिमानू, सुहृदू, चन्दनसार से चर्चित तथा विचित्र मालाओं और आभूषणों से विभूषित भीमसेन उन वीरबन्धुओं से संक्षेप और विस्तारपूर्वक पूर्वोिक्त वचन कहकर चुप हो गये।
जिन्होंने महात्माओं के मुख से धर्म का उपदेश सुना है, उन धर्मात्माओं में श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर ने दो घड़ी तक पूर्व वक्ताओं के वचनों पर भलीभाँति विचार करके मुसकराते हुए यह यथार्थ बात कही।
युधिष्ठिर बोले - बन्धुओ! इसमें संदेह नहीं कि आप लोग धर्मशास्त्रों के सिद्धान्तों पर विचार करके एक निश्चय पर पहुँच चुके हैं। आप लोगों को प्रमाणों का भी ज्ञान प्राप्त है। मैं सबके विचार जानना चाहता था, इसलिये मेरे सामने यहाँ आप लोगों ने जो अपना-अपना निश्चित सिद्धान्त बताया है, वह सब मैंने ध्यान से सुना है। अब आप, मैं जो कुछ कह रहा हूँ, मेरी उस बात को भी अनन्यचित्त होकर अवश्य सुनिये।
जो न पाप में लगा हो और न पुण्य में, न तो अर्थोपार्जन में तत्पर हो न धर्म में, न काम में ही। वह सब प्रकार के दोषों से रहित मनुष्य दुःख और सुख को देने वाली सिद्धियों से सदा के लिये मुक्त हो जाता है, उस समय मिट्टी के ढेले और सोने में उसका समान भाव हो जाता है।
जो पूर्वजन्म की बातों को स्मरण करने वाले तथा वृद्धावस्था के विकार से युक्त हैं, वे मनुष्य नाना प्रकार के सांसारिक दुःखों के उपभोग से निरन्तर पीड़ित हो मुक्ति की ही प्रशंसा करते हैं, परंतु हम लोग उस मोक्षे के विषय में जानते ही नहीं हैं।
स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजी का कथन है कि जिसके मन में आसक्ति है, उसकी कभी मुक्ति नहीं होती। आसक्तिशून्य ज्ञानी मनुष्य ही मोक्ष को प्राप्त होते हैं; अतः मुमुक्षु पुरुष को चाहिये कि वह किसी का प्रिय अथवा अप्रिय न करे।
इस प्रकार विचार करना ही मोक्ष का प्रधान उपाय है, स्वेच्छाचार नहीं। विधाता ने मुझे जिस कार्य में लगा दिया है, मैं उसे ही करता हूँ। विधाता सभी प्राणियों कों विभिन्न कार्यों के लिये प्रेरित करता है। अतः आप सब लोगों को ज्ञात होना चाहिये कि विधाता ही प्रबल है।
मनुष्य कर्म द्वारा अप्राप्य अर्थ नहीं पा सकता। जो होनहार है, वही होती है; इस बात को तुम सब लोग जान लो। मनुष्य त्रिवर्ग से रहित होने पर भी आवश्यक पदार्थ को प्राप्त कर लेता है; अतः मोक्षप्राप्ति का गूढ़ उपाय (ज्ञान) ही जगत का वास्तविक कल्याण करने वाला है।
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजा युधिष्ठिर की कही हुई बात बड़ी उत्तम, युक्तियुक्त और मन में बैठने वाली हुई। उसे पूर्णरूप से समझकर वे सब भाई बड़े प्रसन्न हो हर्षनाद करने लगे। उन सबने कुरुकुल के प्रमुख वीर युधिष्ठिर को अंजलि बाँधकर प्रणाम किया।
जनमेजय! युधिष्ठिर की उस वाणी में किसी प्रकार का दोष नहीं था। वह अत्यन्त सुन्दर स्वर और व्यंजन के संनिवेश से विभूषित तथा मन के अनुरूप थी, उसे सुनकर समस्त राजाओं ने युधिष्ठिरकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें