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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 34
नव नीतं यथा दध्नस्तथा कामोऽर्थधर्मतः । श्रेयस्तैलं च पिण्याकाद्धृतं श्रेय उदश्वितः । श्रेयः पुष्पफलं॑ काष्ठातू कामो धर्मार्थयोर्वर:॥
जैसे दही का सार माखन है, उसी प्रकार धर्म और अर्थ का सार काम है। जैसे खली से श्रेष्ठ तेल है, तक्र से श्रेष्ठ घी है और वृक्ष के काष्ठ से श्रेष्ठ उसका फूल और फल है, उसी प्रकार धर्म और अर्थ दोनों से श्रेष्ठ काम है।
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