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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 22
अस्मिंस्तु वै सुसंवृत्ते दुर्लभे परमप्रिय । इह कामानवाप्नोति प्रत्यक्षं नात्र संशयः ॥
धन अत्यन्त प्रिय और दुर्लभ वस्तु है। इसकी प्राप्ति अथवा सिद्धि हो जाने पर मनुष्य संसार में अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण कर सकता है, इसका सभी को प्रत्यक्ष अनुभव है - इसमें संशय नहीं है।
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