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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 8
धर्मो राजन्गुणश्रेष्ठो मध्यमो ह्यर्थ उच्यते । कामो यवीयानिति च प्रवदन्ति मनीषिणः । तस्माद्धर्मप्रधानेन भवितव्यं यतात्मना ॥
राजन! धर्म ही श्रेष्ठ गुण है, अर्थ को मध्यम बताया जाता है और काम सबकी अपेक्षा लघु है; ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं। अतः मन को वश में करके धर्म को अपना प्रधान ध्येय बनाना चाहिये और सम्पूर्ण प्राणियों के साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिये, जैसा हम अपने लिये चाहते हैं।
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