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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 32
समुद्रं चाविशन्त्यन्ये नराः कामेन संयुताः । कामो हि विविधाकारः सर्वं कामेन सन्ततम् ॥
कामना से युक्त हुए दूसरे मनुष्य समुद्र में भी घुस जाते हैं। कामना के विविध रूप हैं तथा सारा कार्य ही कामना से व्याप्त है।
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