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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 15
जटाजिनधरा दान्ताः पङ्कदिग्धा जितेन्द्रियाः । मुण्डा निस्तन्तवश्चापि वसन्त्यर्थार्थिनः पृथक् ॥
जटा और मृगचर्म धारण करने वाले जितेन्द्रिय संयतचित्त शरीर में पंक धारण किये मुण्डितमस्तक नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी अर्थ की अभिलाषा रखकर पृथक्‌-पृथक्‌ निवास करते हैं।
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