नास्ति नासीन्नाभविष्यद्भूतं कामात्मकात्परम् ।
एतत्सारं महाराज धर्मार्थावत्र संश्रितौ ॥
महाराज! सभी प्राणी कामना रखते हैं। उससे भिन्न कामनारहित प्राणी न कहीं है, न कभी था और न भविष्य में होगा ही; अतः यह काम ही त्रिवर्ग का सार है। धर्म और अर्थ भी इसी में स्थित हैं।
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