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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 42
निःसंशयं निश्चित धर्मशास्त्राः सर्वे भवन्तो विदितप्रमाणाः । विज्ञातु कामस्य ममेह वाक्यम् उक्तं यद्वै नैष्ठिकं तच्छ्रुतं मे । इह त्ववश्यं गदतो ममापि वाक्यं निबोधध्वमनन्यभावाः ॥
युधिष्ठिर बोले - बन्धुओ! इसमें संदेह नहीं कि आप लोग धर्मशास्त्रों के सिद्धान्तों पर विचार करके एक निश्चय पर पहुँच चुके हैं। आप लोगों को प्रमाणों का भी ज्ञान प्राप्त है। मैं सबके विचार जानना चाहता था, इसलिये मेरे सामने यहाँ आप लोगों ने जो अपना-अपना निश्चित सिद्धान्त बताया है, वह सब मैंने ध्यान से सुना है। अब आप, मैं जो कुछ कह रहा हूँ, मेरी उस बात को भी अनन्यचित्त होकर अवश्य सुनिये।
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