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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 5
बाहुश्रुत्यं तपस्त्यागः श्रद्धा यज्ञक्रिया क्षमा । भावशुद्धिर्दया सत्यं संयमश्चात्मसम्पदः ॥
विदुरजी बोले - राजन्‌! बहुत-से शास्त्रों का अनुशीलन, तपस्या, त्याग, श्रद्धा, यज्ञकर्म, क्षमा, भावशुद्धि, दया, सत्य और संयम - ये सब आत्मा की सम्पत्ति हैं।
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