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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 41
ततो मुहूर्तादथ धर्मराजो वाक्यानि तेषाम् अनुचिन्त्य सम्यक् । उवाच वाचावितथं स्मयन्वै बहुश्रुतो धर्मभृतां वरिष्ठः ॥
जिन्होंने महात्माओं के मुख से धर्म का उपदेश सुना है, उन धर्मात्माओं में श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर ने दो घड़ी तक पूर्व वक्ताओं के वचनों पर भलीभाँति विचार करके मुसकराते हुए यह यथार्थ बात कही।
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