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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 48
ततस्तदग्र्यं वचनं मनोऽनुगं समस्तमाज्ञाय ततोऽतिहेतुमत् । तदा प्रणेदुश्च जहर्षिरे च ते कुरुप्रवीराय च चक्रुरञ्जलीन् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजा युधिष्ठिर की कही हुई बात बड़ी उत्तम, युक्तियुक्त और मन में बैठने वाली हुई। उसे पूर्णरूप से समझकर वे सब भाई बड़े प्रसन्‍न हो हर्षनाद करने लगे। उन सबने कुरुकुल के प्रमुख वीर युधिष्ठिर को अंजलि बाँधकर प्रणाम किया।
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