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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 27
विरेमतुस्तु तद्वाक्यमुक्त्वा तावश्विनोः सुतौ । भीमसेनस्तदा वाक्यमिदं वक्तुं प्रचक्रमे ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इतना कहकर नकुल और सहदेव चुप हो गये। तब भीमसेन ने इस तरह कहना आरम्भ किया।
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