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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 17
अर्थार्थिनः सन्ति के चिदपरे स्वर्गकाङ्क्षिणः । कुलप्रत्यागमाश्चैके स्वं स्वं मार्गमनुष्ठिताः ॥
कुछ दूसरे प्रकार के ऐसे लोग हैं, जो स्वर्ग पाने की इच्छा रखते हैं और कुलपरम्परागत नियमों का पालन करते हुए अपने-अपने वर्ण तथा आश्रम के धर्मो का अनुष्ठान कर रहे हैं; किंतु वे भी धन की इच्छा रखते हैं।
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