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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 19
भृत्यान्भोगैर्द्विषो दण्डैर्यो योजयति सोऽर्थवान् । एतन्मतिमतां श्रेष्ठ मतं मम यथातथम् । अनयोस्तु निबोध त्वं वचनं वाक्यकण्ठयोः ॥
धनवान्‌ वही है, जो अपने भृत्यों को उत्तम भोग और शत्रुओं को दण्ड देकर उनको वश में रखता है। बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाराज! मुझे तो यही मत ठीक जँचता है। अब आप इन दोनों की बात सुनिये। इनकी वाणी कण्ठ तक आ गयी है अर्थात्‌ ये दोनों भाई बोलने के लिये उतावले हो रहे हैं।
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