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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 16
काषायवसनाश्चान्ये श्मश्रुला ह्रीसुसंवृताः । विद्वांसश्चैव शान्ताश्च मुक्ताः सर्वपरिग्रहैः ॥
सब प्रकार के संग्रह से रहित, संकोचशील, शान्त, गेरुआ वस्त्रधारी, दाढ़ी-मूँछ बढ़ाये विद्वान्‌ पुरुष भी धन की अभिलाषा करते देखे गये हैं।
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