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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 25
तस्माद्धर्मप्रधानेन साध्योऽर्थः संयतात्मना । विश्वस्तेषु च भूतेषु कल्पते सर्व एव हि ॥
इसलिये मनुष्य अपने मन को संयम में रखकर जीवन में धर्म को प्रधानता देते हुए पहले धर्माचरण करके ही फिर धन का साधन करे; क्योंकि धर्मपरायण पुरुष पर ही समस्त प्राणियों का विश्वास होता है और जब सभी प्राणी विश्वास करने लगते हैं, तब मनुष्य का सारा काम स्वतः सिद्ध हो जाता है।
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