मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 45
स्नेहे न बुद्धस्य न सन्ति तानीत्य् एवं स्वयम्भूर्भगवानुवाच । बुधाश्च निर्वाणपरा वदन्ति तस्मान्न कुर्यात्प्रियमप्रियं च ॥
स्वयम्भू भगवान्‌ ब्रह्माजी का कथन है कि जिसके मन में आसक्ति है, उसकी कभी मुक्ति नहीं होती। आसक्तिशून्य ज्ञानी मनुष्य ही मोक्ष को प्राप्त होते हैं; अतः मुमुक्षु पुरुष को चाहिये कि वह किसी का प्रिय अथवा अप्रिय न करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
षड्जगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

षड्जगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें