स्नेहे न बुद्धस्य न सन्ति तानीत्य्
एवं स्वयम्भूर्भगवानुवाच ।
बुधाश्च निर्वाणपरा वदन्ति
तस्मान्न कुर्यात्प्रियमप्रियं च ॥
स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजी का कथन है कि जिसके मन में आसक्ति है, उसकी कभी मुक्ति नहीं होती। आसक्तिशून्य ज्ञानी मनुष्य ही मोक्ष को प्राप्त होते हैं; अतः मुमुक्षु पुरुष को चाहिये कि वह किसी का प्रिय अथवा अप्रिय न करे।
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