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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 43
यो वै न पापे निरतो न पुण्ये नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे । विमुक्तदोषः समलोष्ट काञ्चनः स मुच्यते दुःखसुखार्थ सिद्धेः ॥
जो न पाप में लगा हो और न पुण्य में, न तो अर्थोपार्जन में तत्पर हो न धर्म में, न काम में ही। वह सब प्रकार के दोषों से रहित मनुष्य दुःख और सुख को देने वाली सिद्धियों से सदा के लिये मुक्त हो जाता है, उस समय मिट्टी के ढेले और सोने में उसका समान भाव हो जाता है।
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