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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 24
अनर्थस्य न कामोऽस्ति तथार्थोऽधर्मिणः कुतः । तस्मादुद्विजते लोको धर्मार्थाद्यो बहिष्कृतः ॥
निर्धन मनुष्य की कामना पूर्ण नहीं होती और धर्महीन मनुष्य को धन भी कैसे मिल सकता है। जो पुरुष धर्मयुक्त अर्थ से वंचित है, उससे सब लोग उद्दिग्न रहते हैं।
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