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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 29
कामेन युक्ता ऋषयस्तपस्येव समाहिताः । पलाशफलमूलाशा वायुभक्षाः सुसंयताः ॥
किसी-न-किसी कामना से संयुक्त होकर ही ऋषिलोग तपस्या में मन लगाते हैं। फल, मूल और पत्ते चबाकर रहते हैं। वायु पीकर मन और इन्द्रियों का संयम करते हैं।
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