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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 38
बुद्धिर्ममैषा परिषत्स्थितस्य मा भूद्विचारस्तव धर्मपुत्र । स्यात्संहितं सद्भिरफल्गुसारं समेत्य वाक्यं परमानृशंस्यम् ॥
धर्मपुत्र! मैंने गहराई में पैठकर ऐसा निश्चय किया है। मेरे इस कथन में आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरा यह वचन उत्तम, कोमल, श्रेष्ठ, तुच्छतारहित एवं सारभूत है; अतः श्रेष्ठ पुरुष भी इसे स्वीकार कर सकते हैं।
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