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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 28
नाकामः कामयत्यर्थं नाकामो धर्ममिच्छति । नाकामः कामयानोऽस्ति तस्मात्कामो विशिष्यते ॥
भीमसेन बोले - धर्मराज! जिसके मन में कोई कामना नहीं है, उसे न तो धन कमाने की इच्छा होती है और न धर्म करने की ही। कामनाहीन पुरुष तो काम (भोग) भी नहीं चाहता है; इसलिये त्रिवर्ग में काम ही सबसे बढ़कर है।
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