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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 4
ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः प्रथमं प्रतिभानवान् । जगाद विरुदो वाक्यं धर्मशास्त्रमनुस्मरन् ॥
तब अर्थ की गति और तत्त्व को जानने वाले प्रतिभाशाली विदुरजी ने धर्मशास्त्र का स्मरण करके सबसे पहले कहना आरम्भ किया।
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