मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 49
सुचारु वर्णाक्षर शब्दभूषितां मनोऽनुगां निर्धुत वाक्यकण्टकाम् । निशम्य तां पार्थिव पार्थ भाषितां गिरं नरेन्द्राः प्रशशंसुरेव ते । पुनश्च पप्रच्छ सरिद्वरासुतं ततः परं धर्ममहीन सत्त्वः ॥ ॥ इति षड्जगीता समाप्ता ॥
जनमेजय! युधिष्ठिर की उस वाणी में किसी प्रकार का दोष नहीं था। वह अत्यन्त सुन्दर स्वर और व्यंजन के संनिवेश से विभूषित तथा मन के अनुरूप थी, उसे सुनकर समस्त राजाओं ने युधिष्ठिरकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
षड्जगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

षड्जगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें