एतदेवाभिपद्यस्व मा ते भूच्चलितं मनः ।
एतन्मूलौ हि धर्मार्थावेतदेकपदं हितम् ॥
युधिष्ठिर! तुम इन्हीं को प्राप्त करो। इनकी ओर से तुम्हारा मन विचलित नहीं होना चाहिये। धर्म और अर्थ की जड़ ये ही हैं। मेरे मत में ये ही परम पद हैं।
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