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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 36
नाकामतो ब्राह्मणा: स्वन्नमर्था- न्‍नाकामतो ददति ब्राह्मणेभ्य: । नाकामतो विविधा लोकचेष्टा तस्मात्‌ काम: प्राक्‌ त्रिवर्गस्य दृष्ट:॥
बिना किसी कामना के ब्राह्मण अच्छे अन्न का भी भोजन नहीं करते और बिना कामना के कोई ब्राह्मणों को धन का दान नहीं करते हैं। जगत्‌ के प्राणियों की जो नाना प्रकार की चेष्टा होती है, वह बिना कामना के नहीं होती; अतः त्रिवर्ग में काम का ही प्रथम एवं प्रधान स्थान देखा गया है।
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