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षड्जगीता • अध्याय 1 • श्लोक 10
कर्मभूमिरियं राजन्निह वार्ता प्रशस्यते । कृषिवाणिज्य गोरक्ष्यं शिल्पानि विविधानि च ॥
अर्जुन बोले - राजन्‌! यह कर्मभूमि है। यहाँ जीविका के साधनभूत कर्मो की ही प्रशंसा होती है। खेती, व्यापार, गोपालन तथा भाँति-भाँति के शिल्प - ये सब अर्थप्राप्ति के साधन हैं।
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