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अध्याय 1 — ज़फ़रनामा

ज़फ़रनामा
135 श्लोक • केवल अनुवाद
संकल्प— हे साक़ी (परमात्मा) मुझे हरे रंग का मधुपात्र दे, जिससे कि वह मेरे लिए युद्धकाल में कार्योपयोगी, सिद्धप्रद हो। तू मुझे वह दे (अवश्य दे), जिससे कि मैं अपने हृदय को ताज़ा कर लूं और कीचड़ में सने मोती (दुर्देशाग्रस्त देश और समाज रूपी मोती) को कीचड़ से निकाल दूं।
उस भगवान का नाम लेकर, (प्रणाम करता है) जो कि तलवार, छुरा, बाण, बरछा और ढाल का प्रभु है।
(उस भगवान का नाम लेकर) जो कि युद्ध में प्रीक्षित वीर पुरुषों का स्वामी है, और जो कि (वेग की अधिकता से) वायु में चरण रखने वाले घोड़ों का प्रभु है।
वही जिसने तुझे राज्य शासन दिया, (उसी ने) मुझे धर्म रक्षा की दौलत दी।
तुझको तुर्कपन और ताज़ीपन— छल और झूठ के साथ दिया, (उसी ने) मुझे चिकित्सा करने की सामर्थ्य — सचाई और चितशुद्धि के साथ दी।
तुझे औरंगजेब (शासन शोभा) नाम शोभा नहीं देता। (क्योंकि) औरंगजेबों से (राजाओं से) छल नहीं मिलता।
तेरी माला मनका और डोरा से ज्यादा है। क्योंकि उससे (दाने से) तू दाना डालता है और उससे (डोरे से) अपना जाल फैलाता है। (भावार्थ— तू जो भजन करने का ढोंग करता है वह इसलिये है कि लोग तुझ पर विश्वास कर लें और तू उन्हें फाँस ले।)
Krishjan
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