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अध्याय 1 — ज़फ़रनामा
ज़फ़रनामा
135 श्लोक • केवल अनुवाद
संकल्प:- हे साक़ी (परमात्मा) मुझे हरे रंग का मधुपात्र दे, जिससे कि वह मेरे लिए युद्धकाल में कार्योपयोगी, सिद्धप्रद हो। तू मुझे वह दे (अवश्य दे), जिससे कि मैं अपने हृदय को ताज़ा कर लूं और कीचड़ में सने मोती (दुर्देशाग्रस्त देश और समाज रूपी मोती ) को कीचड़ से निकाल दूं।
उस भगवान का नाम लेकर, (प्रणाम करता है) जो कि तलवार, छुरा, बाण, बरछा और ढाल का प्रभु है।
(उस भगवान का नाम लेकर) जो कि युद्ध में प्रीक्षित वीर पुरुषों का स्वामी है, और जो कि (वेग की अधिकता से) वायु में चरण रखने वाले घोड़ों का प्रभु है।
वही जिसने तुझे राज्य शासन दिया, (उसी ने) मुझे धर्म रक्षा की दौलत दी।
तुझको तुर्कपन और ताज़ीपन - छल और झूठ के साथ दिया, (उसी ने) मुझे चिकित्सा करने की सामर्थ्य - सचाई और चितशुद्धि के साथ दी।
तुझे औरंगजेब (शासन शोभा) नाम शोभा नहीं देता। (क्योंकि) औरंगजेबों से (राजाओं से) छल नहीं मिलता।
तेरी माला मनका और डोरा से ज्यादा है। क्योंकि उससे (दाने से) तू दाना डालता है और उससे (डोरे से) अपना जाल फैलाता है। भावार्थ - तू जो भजन करने का ढोंग करता है वह इसलिये है कि लोग तुझ पर विश्वास कर लें और तू उन्हें फाँस ले।
तूने बाप की मिट्टी को अपने दूषित कार्यों से भाई के खून के साथ गूँथा।
और उससे (रक्त और मिट्टी के गारे से) तूने कच्चे घर की नींव रखी - अपना ऐश्वर्य भवन बनाने के लिये।
मैं अब अकाल पुरुष की कृपा से लोहे के पानी से (चमकीले हथियारों से) ऐसी वर्षा करुंगा:--
कि हरगिज़ इस अशुभ चारदीवारी (मुगल शासन रूपी भवन की चारदीवारी) का इस पवित्र (भारत) भूमि पर चिन्ह भी न रह जाय।
तू दक्षिण के पहाड़ों से (महारष्ट्र से) असफल होकर आया है, और मेवाड़ से भी (पराजय की) कड़वी घूट पीकर आया है।
इस दिशा (पंजाब) की ओर जब तेरी निगाह पड़ती है तो वह कड़वाहट और असफलता तुझे भूल जाती है।
ऐसी आग तेरे जूतों के नीचे रखूंगा कि पंजाब से तुझे पानी भी नहीं पीने दूंगा।
क्या हुआ यदि सियार ने छल और कपट से इस तरह शेर के दो बच्चों को मार दिया।
जबकि वीर शेर जीवित रहता है तो वह तुझसे प्रतिशोध लेगा।
तेरे (औरंगज़ेब के) खुदा के नाम लेने से मैं और धोखे में नहीं आऊंगा। क्योंकि मैं तेरे खुदा और तेरे खुदा के कल्लाम को देख चुका हूँ।
तेरी सौगन्ध पर (मुझे) विश्वास नहीं रहा। मेरे लिये सिवा तलवार के (प्रयोग के) और काम नहीं रहा।
तू (औरंगजेब) यदि वयोवृद्ध अनुभवी भेड़िया है, तो मैं भी सिंह को (सिंह नामधारी शिष्य-सिख सम्प्रदाय को) जाल से बाहर खुला रखता हूँ।
मेरे साथ अगर तेरी बातचीत हो तो मैं तुझे पवित्र मार्ग दिखाऊँ।
लड़ाई के मैदान में (मेरी तेरी) दोनों सेना पंक्तिबद्ध हों और दूर से ही एक दूसरे को दिखाई पड़ती रहे।
दोनों (सेनाओं के) बीच में दो फ़र्सग रास्ता रहें - जब यह रणभूमि सुसज्जित हो ।
उसके बाद में युद्ध क्षेत्र के बीच में मैं तेरे पास दो घुड़सवारों के साथ आाऊँ (गा)।
तूने लाड़ चाव से (बिना मेहनत किये, बिना कष्ट उठाये) फल खाये है (दूसरों की मेहनत के)। योद्धा पुरुषों से (लड़कर) तूने फल (मजा) नहीं चखा।
(तू) स्वयं तलवार कटार लेकर मैदान में आ। ईश्वर की (निर्दोष) सृष्टि को उथल पुथल मत कर। यह चुनौती देने के बाद कहीं परमात्मा की दृष्टि में अविनय और अतिरेक न हो गया हो इसलिये गुरुजी परमात्मा की स्तुति करते हैं। इसमें हमें वैदिक ऋषि की भावना के दर्शन होते हैं जो शत्रु से लड़ता भी थ। तो परमात्मा को अपना न्याय कर्ता मानकर प्रार्थना में लीन हो जाता था "योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ।" (जो हमसे द्वेष करता है, जिसे हम द्वेष करते हैं उनको तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं - आपके सुपुर्द करते हैं।)
वह-पूर्णो से भी पूर्ण है, सदा स्थिर रहने वाला है और कृपालु है। इच्छानुसार देनेवाला है, रोटी रोजी देने वाला है, कृपालु और दयालु है।
(वह सबको) शरण देने वाला है, दाता और सहायक है। अपराधो को क्षमा करने वाला है, जीविका देने वाला है और चित्त को प्रसन्न करने वाला है।
(वह) राजाओं का भी राजा है, गुण और विशिष्टता प्रदान करने वाला है, तथा पथप्रदर्शक है। वह वर्ण रहित, (वर्णाभेद रहित) और तर्क से परे, और निराकार है ।
(जिनके पास) न साज सामान है, न बाज है, न सेना है और न धरती है, (उन्हें भी कृपा होने पर) भगवान ऐश्वर्य और स्वर्ग देने वाला है।
उस जाहिर जहूर (साक्षात् प्रकट) के नीचे यह पवित्र संसार स्थित है। वह साक्षात उपस्थित के समान धन सम्पत्ति देता रहता है।
वह दाता है, पवित्र और सबका पालन कर्त्ता हैं। वह दयालु है, और हर देश को रोज़ी देते वाला है।
(वह) देशों का स्वामी है, (वह) महानों से महान् है। सौन्दर्य में रूप वही है, वह रोजी देनेवाला है और दयालु है।
वह चतुरता का स्वामी है, निर्बलों का पालक है। दीनप्रति पालक है और दुष्टों का नाशक है।
(वह) कानूनों का पालक है और बड़प्पन से पूर्ण है। सत्य का ज्ञाता है और श्रुतियों का रचयिता है।
वह ज्ञान रखने वाला है, और चतुरता का स्वामी है। सचाई का जानने वाला है और प्रकट करने वाला है।
वह सारी विद्याओं का जानने वाला है, आलिम (विद्धान्) है और प्रभु है। वह दुनियाँ के सारे कामों को खोलने वाला है, प्रकाशक हैं।
वह दुनियाँ के कामों को पूरा करने वाला है, महान् है। समस्त विद्याओं का ज्ञाता है, विद्वान है और विश्व नायक है। उक्त प्रार्थनाओं में हमें गुरुजी के भक्त हृदय के दर्शन होते हैं। इनमें यत्र तत्न प्रभु के गुणों को दोहराया गया है। इसमें प्रभु भक्ति और भक्ति-तन्मयता ही कारण समझना चाहिये। पुनरुक्ति दोष की आशंका नहीं करनी चाहिये क्योंकि भगवान के नाम स्मरणा में पुनरुक्ति दोष नहीं होता। इसके उपरान्त पुन: गुरुजी औरंगजेब को उसकी शपथ तोड़ने के लिये धिक्कार देते हैं।
मुझको (तेरी) इस शपथ पर विश्वास नहीं है कि “भगवान् साक्षी है“-"परमात्मा एक है"।
मुझे उस शपथ पर विन्दु भर भी विश्वास नहीं है। क्योंकि तेरे बख्शी (दानाध्यक्ष) और दीवान (आदि पदाधिकारो) जो मेरे पास तेरा सन्देशा लेकर आये थे) सभी झूठ बोलने वाले हैं।
जो कोई तेरी कुरान की क़सम का ऐतबार करे (गा), वह भी अन्तिम दिन (मृत्यु के दिन अथवा क़यामत के दिन) में दु:खी और अपमानित हो (गा)।
(जिस) किसी पर हुमा नामक पक्षी की छाया पड़ जाती है उस पर कौआ हाथ नहीं डाल सकता (चाहे वह कौआ अपने को कितना ही दिलेर क्यों न माने)। गुरुजी ने लाक्षणिक रूप से बताया है कि जो अमृत चख चुके हैं और शिष्यत्व स्वीकार कर चुके हैं वे सिख मानो हुमा नामक पक्षी की छाया के नीचे गुजर कर बादशाह बन चुके हैं - उन पर औरंगजेब और उसकी सेना रूपी कोए हाथ नहीं डाल सकते चाहे वे कितना ही दिलेर अपने आपको क्यों न समझते हों।
(यदि) कोई शेर नर को पुश्त के पीछे रखता है तो उस राहगुज़र-मार्ग को बकरा, भेड़, हिरन आदि नहीं पकड़ते। गुरुजी का अभिप्राय है कि मेरी पीठ पर खालसा रूपी सिंह का पृष्ठबल है। मेरी तरफ़ मुगल सेना रूपी, भेड़, बकरे, हिरन आदि को भेजने का साहस मत करना।
यदि मैं गुप्त रूप से भी धर्म की शपथ खाता तो मैं उससे एक क़दम भी आगे पीछे नहीं रखता। गुरुजी का संकेत आनन्दपुर साहब तथा चमकौर साहब पर मुगलों के आक्रमण के समय धर्म की कसम खाने और उसको तोड़कर पुन: हमला कर देने को ओर है।
चालीस भूखे आदमी क्या काम करते, जबकि दस लाख उन बेखबरों के ऊपर आ पड़े।
सहसा कसम तोड़ने वाले आ पहुँचे। तलवार, तीर और भालों के बीच आ पहुँचे।
तब मैं विवश होकर बीच में आया। तथा धनुष बाण से सन्नद्ध होकर आया।
जब काम हर उपाय से गुज़र जाए तो तलवार सहित हाथ उठाना धर्म सम्मत है।
(तेरी) कुरान की क़सम का मैं क्या विश्वास करू। तू अन्यथा (काम निकालने पर) कह देता है कि मुझे! इससे क्या काम।
मैं नहीं जानता था कि यह पुरुष (औरंगज़ेब) लोमड़ी की तरह चालाक है। वरना मैं इस शपथ पर विश्वास के मार्ग पर कभी भी ज़रा सा भी नहीं आता।
वह हर कोई जो कि कुरान की क़सम से आया है उसे घायल करना या मार डालना उचित नहीं है।
मक्खियों के समान रात में छुपकर वे आये। और (आते ही) वे क्रोध में उत्तेजित हो उठे।
हर वह जो कि दीवार से बाहर आया। वह एक ही तीर खाकर अपने ही खून में डूब गया।
जो कोई भी उस किले से बाहर नहीं आया, उसने न तीर खाया और न वह अपमानित हुआ।
जब मैंने (तेरे सेनापति) नाहरखाँ को युद्ध के लिये आते देखा तो उसने तुरन्त ही मेरे एक तीर का मज़ा चखा।
युद्धकाल में अन्त में भागते भी हैं और बहुत से ख़ान (युद्धक्षेत्र से) बाहर शेखीखोरी (भी) करते हैं।
इतने ही में दूसरी अफ़ग़ान सेना युद्ध के लिये आई। बहती जलधारा के समान तीर और भालों के प्रवाह सहित।
बहुतों ने हमला किया बहुतों ने घाव खाये (उन्होंने हमारे पक्ष के) दो आदमियों (गुरुजी के दो पुत्रों अ्जीत सिंह, तथा जुभार सिंह) को मार दिया और अपनी जान भी देदी।
वह ख्वाजा जफ़रबेग निन्दित, बदनाम और ज़लील, मैंदान में मरदों की तरह नहीं आया।
अफसोस, यदि मैं उसका मुँह देखता तो एक असाध्य (जिससे बचने का कोई चारा न हो) तीर उसको देता (मार डालता )।
अन्त में, बहुत से (लोग) तीर और तुफंग (भाले) से घायल हुए और दोनों पक्षों के बहुत से आदमी अविलम्ब मारे गये।
बहुत बाणवर्षा हुई और तीर और तलवार (चले) जिससे कि जमीन गुले लाला के रंग की (लाल) हो गई ।
(कटे हुए) सिरों और हाथों पैरों का ऐसा ढेर हो गया कि युद्ध का मैदान मानो गेंदों और बल्लों से भर गया।
(जैसे ही) तीर और कमान की आवाज़ निकली, (वैसे ही) दुनियाँ से हाय हुय की आवाज आने लगी।
इसके उपरान्त प्रतिहिंसा की कोशिश करने वाले धनुर्धरों ने (ऐसा) कोलाहल किया कि मर्दों के भी मर्दों के होश भूल गये।
आख़िर मर्दानगी भी क्या युद्ध करे। कि सिर्फ चालीस के ऊपर असंख्य लोग आ चढ़े।
जब विश्वदीप सूर्य पर्दे के पीछे छुप गया तब सबको भासित करने वाला चन्द्रमा उदित हुआ।
वह हर व्यक्ति जो ईश्वर के वाक्यों पर विश्वास करता है। उसके ऊपर भगवान् स्वयं मार्गदर्शक बनकर आता है।
न बाल बांका हुआ न देह को कष्ट हुआ कि मैं दुश्मनों को मारने वाला ख़ुद-सशरीर बाहर निकल आया।
मैं नहीं जानता था कि यह आदमी वचन तोड़ने वाला है (और) कि दौलत-राज्यसत्ता का पुजारी है और धर्मविश्वास को तोड़ने वाला है।
न इसमें धर्म विश्वास के प्रति पूजाभाव है, न धर्माचार है। न मालिक, ईश्वर का ज्ञान है और न दृढ़ विश्वास है।
हर वह आदमी जो अपने ईमान (धर्मविश्वास) की पूजा करता है। (वह) अपनी प्रतिज्ञा में आगा पीछा नहीं करता।
मुझे इस आदमी का विश्वास नहीं है। इसके - "कुरान की क़सम है, या भगवान एक अद्वैत है" (जसी शपथों ) से क्या?
(यदि) कुरान की सौगन्ध कसम भी (ऐसा पुरुष) स्वीकार करे तो भी मुझे उससे एक क़तरा भर विश्वास भी नहीं आता।
यदि तुझे (मेरे प्रति कहे हुए अपने वचनों पर) स्वयं विश्वास होता तो कमर बांधकर (प्रस्तुत होकर) स्वयं सामने आता।
तेरे सिर पर यह वाक्य (जो तूने मुझे कहा) फर्ज है (था), भगवान की क़सम और मेरे साथ (की गयी) यह क़सम।
यदि आप स्वयं दिलोजान से (काम को पूरा करने के लिये) खड़े हो जाँय तो काम सिद्ध हो जाय।
तेरे लिये यह फ़र्ज (कर्तव्य) है कि तू कर्तव्य पालन करे (तथा) (अपने) लिखे हुए के अनुसार (अपने कामों की) तुलना करे।
(तेरा) लिखा हुआ (पत्र) मिला और (पत्रवाहक दूत के द्वारा) ज़बानी कहा हुआ भी। उचित है कि काम (सबके लिये) सुख पहुँचाने वाला हो। (इससे पता चलता है कि यह ज़फ़रनामा गुरुजी ने औरंगज़ेब के पत्र के उत्तर में और ज़बानी सन्देश के उत्तर में औरंगज़ेब को लिखा था।)
इसी प्रकार पुरुष को चाहिये कि देखने वाला हो। पेट में ओर, मुंह में ओर नहीं होना चाहिये।
जो (तेरे) क़ाज़ी ने मुझे कहा है उससे मैं बाहर नहीं हूँ। यदि तू सच्चा है तो (यहां) स्वयं आ। (इससे ज्ञात होता है कि औरंगज़ेब ने अपना क़ाजी गुरुजी के पास भेजा था)
यदि वह तेरी कुरान की क़सम सच्ची है, तो मैं उसी को तेरे पास भेजता हूँ। (अर्थात यदि तू कुरान की कसम ठीक और सच्ची खाता हो, मुझे बुलाने के लिये, तो मैं भी वही कसम तेरे पास भेजता हूँ, अर्थात मैं भी कुरान की कसम खाता हूँ कि तू मुझ से आकर मिल, मैं तुझसे धोखा नहीं करूगा।) पत्र में औरंगजेब ने गुरुजी को कुरान की कसम खाकर विश्वास दिलाया था कि आप बेखोफ़ आइये, मैं कुरान की कसम खाकर कहता हूँ कि आप के साथ धोखा नहीं होगा। इस शेर के द्वारा गुरुजी कहते हैं कि यदि तेरी कुरान की कसम सच्ची है और तेरे मन में खोट नहीं है तो मैं भी कुरान की कसम खाकर कहता हूँ कि तू ख़ुद आ, तेरे साथ धोखा नहीं होगा।
अगर आप कांगड़ा के कस्बे में पधारें और उसके बाद (हम दोनों का) परस्पर मिलन हो।
तेरे लिये इस राह में (मुभसे मिलने के लिये काँगड़ा में आने में) कणमात्र भी ख़तरा नहीं है। (क्योंकि) सारी बैराड़ जाति मेरी आज्ञा में है।
आ, ताकि मैं स्वयं तुझसे बात करूं। (तथा) तेरे प्रति कृपा करूं।
एक हज़ार घोड़ों में से चुनकर एक घोड़ा (ले), (और उसके साथ) आ, ताकि तू मुझसे यह देश (पंजाब) जीत ले। गुरुजी का अभिप्राय है कि तू जीतने की इच्छा रखता है तो अश्वमेध यज्ञ की तरह अपना घोड़ा इधर भेज दे और धर्मयुद्ध के द्वारा मुझसे यह देश जीत ले। यह क्या कि पन्नों और जबानी सन्देशों के द्वारा शान्ति की बात करता है और छुपकर घात करता है।
यदि तू भगवान की पूजा करता है तो मेरे इस कार्य में सुस्ती न कर।
(तेरे लिये) उचित है कि तू ईश्वर को जाने। किसी के कहने पर किसी को दुखी न कर।
तेरा न्याय और धर्मरक्षकत्व विचित्र है। ऐसी सरदारी पर अफ़सोस है अफ़सोस है।
तेरा यह फतवा (धर्म की व्यवस्था) अजीब है अजीब है। (क्योंकि) सचाई के सिवा (कुछ भी) कहना अपराध है।
किसी के ऊपर बेधड़क तलवार चलाकर खून मत बहा। तेरा भी खून आकाश (भगवान् नियति) तलवार से फैलाता है (फैलायेगा)। (इस शेर में हमें गुरुजी के भविष्य दृष्टा रूप के दर्शन होते हैं। वास्तव में औरंगजेब के उपरान्त उसके वंश का जिस निर्दयता से रक्त बहाया गया, उससे इस शेर की सत्यता प्रमाणित होती है।)
ईश्वर को जानने का दावा करने वाले आदमी! तू गाफ़िल मत हो। क्योंकि वह (परमात्मा) हर प्रकार के धन्यवादों (और प्रणामों) से निरपेक्ष है।
वह निःसन्देह बादशाहों का भी बादशाह है। वह देश काल का (पृथ्वी और समय का) सच्चा स्वामी है।
वह परमेश्वर देशकाल का स्वामी है और वह प्रत्येक आश्रय और आश्रित का न्यायकर्त्ता है।
वह निर्बल चींटी और विशाल हाथी सबसे समान व्यवहार करता है। वह निर्बल का रक्षक है और ग़ाफ़िल को नष्ट करने वाला है।
कि जब उसका नाम निर्बलों का रक्षक है कि वह हर धन्यवाद (प्रणाम आदि) से निरपेक्ष-निरीह है।
वह वर्ण से रहित (वर्णभेद से रहित) है, वह तर्क से परे है। वह पथ प्रदर्शक भी है और यात्री भी है।
कुरान की क़सम के साथ (कहा हुआ) तेरे सिर पर फ़र्ज है। अपने कहे के अनुसार अच्छाई के काम को (मंजिल तक) पहुँचा (कर)।
उचित है कि तू बुद्धि-ज्ञान की पूजा करे (अकल से काम ले), (उसके, परमात्मा के) काम में अत्याचार करता है।
क्या हुआ अगर चार बच्चे (साहबज़ादे, अजीतसिह, जुभारसिह, जोरावरसिह, फतहसिह) मारे गये। अभा कुण्डल वाले महाविष सर्प शेष बचे हुए हैं।
यह क्या मर्दानगी है कि तू चिनगारियों को बुझाता है और अग्नि नि:श्वासों (यहाँ श्लेष है - अग्नि है जिनके निःश्वास में ऐसे मनस्वी जनों को तथा अग्नि की लपटों) को कन्धे तक उठाता है।
सुन्दर ढंग से बयान करने वाले (सुश्लोक) फिरदौसी कवि ने कितना अच्छा कहा है कि - “जल्दी का काम शैतान (आहरमन) का होता है।”
तेरी राज्य सभा में (तेरे शपथपूर्वक निमंत्रण के अनुसार) जब से मैं तेरे पास आऊं, उसी दिन से तू इस प्रकार साक्षी होगा। (अर्थात यदि मैं दरबार में आऊं और मेरे साथ धोखा हुआ तो क़यामत के दिन तू साक्षी होगा कि यह व्यक्ति मेरे विश्वास के कारण संकट में पड़ा।)
और यदि तू यह (बुलाकर सफ़ाई करने के वादे को) भी भूल जाय तो तुझे भी भगवान भूल जायगा।
अगर (मेरे) इस काम पर तूने कमर कसली तो परमात्मा तेरे लिये लाभकारी, उपकारी होगा।
यह काम अच्छा है, धर्मरक्षा का है, ईश्वर को जानना है और प्राणों की भलाई का है।
मैं तुझे ईश्वर को जानने वाला (आस्तिक) नहीं जानता (समझता) क्योंकि तुझसे अनेक दिल को दुख पहुँचाने वाले काम मिले हैं (हुए हैं)।
यदि तू भगवान को कृपालु जानता तो तू इस प्रकार शासन से बड़प्पन नहीं चाहता।
अगर तू कुरान से सौ कसम खाय, (तो भी) मुझे कणमात्र भी विश्वास नहीं है।
ऐ औरंगजेब! तू शाहों का शाह (अपने को मानकर) खुश है। और (अपने को) चालाक दस्त (दक्षपाणि) तथा सुयोग्य चाबुक सवार (जो शासन पर दृढ़ता से दण्ड के द्वारा शासन करता हो) (समझता) है। यहाँ जिन गुणों की चर्चा अथवा आरोप है उनका कथन - “तू ऐसा वास्तव में है नहीं” यह बताने के लिये किया गया है। इसके बाद गुरुजी पुन: ईश्वर के गुणगान में प्रवत्त हुए। आगे के चार शेरों में गुरुजी ने ईश्वर की अपने ऊपर कृपा का वर्णन किया है और भक्तितन्मय हृदय से उसकी महिमा का गान किया है। यहाँ ईश्वर के स्तवन में बार बार पुनरुक्ति हुई है लेकिन प्रभु कीर्तन में पुनरुक्ति दोष नहीं मानना चाहिए।
वह रूप में सोन्दर्य है, ज्योतित हृदय वाला है। वह देशों का स्वामी है, स्वामी हैं ओर प्रभु है। (यहाँ गुरुजी का अभिप्राय है कि जेसा तू अपने आपको शाहों का शाह और चतुर तथा स्थिति का नियामक मानता है, हे औरंगज़ेब तू नहीं, बल्कि परमात्मा ही सब कुछ है, उसी की छवि से सुन्दर व्यक्ति रूपमान हैं, वही पृथ्वी का स्वामी है और वहीं एक मालिक ऐसा है जो नमस्य है। तू जो अपने आपको शाहानेशाह आदि मानता है वह ग़लत है।)
वह बुद्धि को सज्जा से और तलवार की चेष्टा से (संयुक्त हैं।) वह देग (सम्पत्ति) का और तेग़ (शस्त्रबल) का भी मालिक है।
वह रोशन (प्रकाशित) हृदय वाला है और सुन्दरों में सुन्दर है। वही विधाता है और देश और धन का देने वाला है।
पहाड़ी युद्ध में उसका दान (परमात्मा की कृपा से विजय प्राप्ति रूपी) महान था। वह समस्त अच्छे गुणों से पूर्ण और सप्तऋषि तारा मण्डल की शान वाला है। (थहाँ पहाड़ी राजाओं से युद्ध और परमात्मा की कृपा से उन पर विजय प्राप्ति का हवाला दिया गया है।)
ऐ औरंगजेब! तू शाहन्शाह होकर भी धिक्कार का पात्र है। क्योंकि तू न्याय से दूर है तथा धर्म से भी दूर है।
मैंने धूर्त पहाड़ी राजाओं (केसरी चन्द, अजमेरी चन्द, हरि चन्द आ्रादि) को मारा है। वे दिल्ली के देवता के पूजक थे और में उस प्रतिमा का भंजक हूँ।
निर्दयी समय का चक्कर देख। (दुश्मनों ने) पीठ पीछे से हमला किया और हानि पहुँचाई।
पवित्र प्रभु की नेक (दयामयी) लीला को देख कि एक (आदमी) से (वह) दस लाख का वध करवाता है।
अगर दोस्त (परमात्मा) महरबान हो तो दुश्मन क्या कर सकता है। क्योंकि दानशीलता, उदारता उस उदार दाता का काम है ।
उसने (मुझे) रिहाई (मुक्ति) दी (उसने मुझे) मार्ग दिखाया और मेरी जिहा को गुणगान की सामर्थ दी।
दुश्मन के लिये उसने काम (संकट) के समय अंधेरा किया और यतीमों (अनाथों - जिनका कोई रक्षक नहीं था। अपने और अपने पाँच सिक्खों की ओर इशारा है) को कांटे का भी ज़ख्म लगे बिना वह बाहर ले आया।
हर वह आदमी जो उससे (परमात्मा से) वफ़ादारी करता है। वह कृपालु (भगवान्) उस पर दया करता है।
यदि कोई बहुतों की हृदय और प्राण से सेवा करे तो ईश्वर उसको शान्ति और सवास्ति प्रदान करता है।
जब शत्रु उस (ईश्वर भक्त) से चालाकी करता है तो भगवान् स्वयं उसकी सहायता करता है।
अगर एक (आदमी) पर (हमला करने के लिये) आते हैं लाख तो उसका निगहबान (रक्षक) भगवान होता है।
तेरी नज़र अगर सेना और सोने पर है, तो मेरे साथ ईश्वर को देखने वाली आँख है।
कि उसको देश (पर शासन करने) का और धन का गर्व है। मेरे साथ अकाल पुरुष की शरणा है।
इस नाशवान सराय (रूपी दुनियाँ) से तू ग़ाफ़िल (प्रमत्त) मत हो क्योंकि जगत निरन्तर गुजरता जा रहा है।
कैखुसरो राजा कहाँ है, जमशेद राजा का प्याला कहाँ है। हजरत आ्रदम कहाँ है जोकि मौत को सुपुर्द कर दिये गये।
फ़रेदू कहाँ है, बहमन और इस्फ़न्दयार कहाँ हैं, (समय के इस आवर्त में) दारा का उत्थान पतन किसी गिनती में नहीं आता।
सिक़न्दर बादशाह कहाँ है, शेरशाह कहां है। एक भी जीवित और स्थान पर अच्युत नहीं है।
आज तैमूर लंग कहाँ है, बाबर कहाँ है, हुमायू कहाँ है और अकबर बादशाह कहाँ है।
ज़माने (समय) की बेवफ़ाई का चक्कर देख कि हर एक पर (समय समय पर) जीव (गृही) और देह (गृह) बदलते जाते हैं।
और तू यदि दीन-दुर्बल को सताता है तो भगवान की क़सम को आरी से चीरता है।
यदि भगवान् मित्र हो तो दुश्मन क्या कर सकता है। भले ही वह सौ शरीरों से दुश्मनी कर ले।
शत्रु यदि हजार (तरह से) दुश्मनी करे तो भी उसका (ईश्वर की कृपा से युक्त व्यक्ति का) एक भी बाल कोई नहीं कमज़ोर कर सकता।
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