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ज़फ़रनामा • अध्याय 1 • श्लोक 41
हुमाँ रा कसे साया आयद बज़ेर । बर ऊ दस्त दारद न जाग़े दिलेर ॥
(जिस) किसी पर हुमा नामक पक्षी की छाया पड़ जाती है उस पर कौआ हाथ नहीं डाल सकता (चाहे वह कौआ अपने को कितना ही दिलेर क्‍यों न माने)। गुरुजी ने लाक्षणिक रूप से बताया है कि जो अमृत चख चुके हैं और शिष्यत्व स्वीकार कर चुके हैं वे सिख मानो हुमा नामक पक्षी की छाया के नीचे गुजर कर बादशाह बन चुके हैं - उन पर औरंगजेब और उसकी सेना रूपी कोए हाथ नहीं डाल सकते चाहे वे कितना ही दिलेर अपने आपको क्‍यों न समझते हों।
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