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ज़फ़रनामा • अध्याय 1 • श्लोक 100
चि मर्दी कि अखगर खमोशाँ कुनी | कि आतिश दमाँ रा बदोशाँ कुनी ॥
यह क्‍या मर्दानगी है कि तू चिनगारियों को बुझाता है और अग्नि नि:श्वासों (यहाँ श्लेष है - अग्नि है जिनके निःश्वास में ऐसे मनस्वी जनों को तथा अग्नि की लपटों) को कन्धे तक उठाता है।
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