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ज़फ़रनामा • अध्याय 1 • श्लोक 109
खुशत शाहे शाहान ओरंगज़ेब । कि चालाक दस्तस्त चाबुक रकेव ॥
ऐ औरंगजेब! तू शाहों का शाह (अपने को मानकर) खुश है। और (अपने को) चालाक दस्त (दक्षपाणि) तथा सुयोग्य चाबुक सवार (जो शासन पर दृढ़ता से दण्ड के द्वारा शासन करता हो) (समझता) है। यहाँ जिन गुणों की चर्चा अथवा आरोप है उनका कथन - “तू ऐसा वास्तव में है नहीं” यह बताने के लिये किया गया है। इसके बाद गुरुजी पुन: ईश्वर के गुणगान में प्रवत्त हुए। आगे के चार शेरों में गुरुजी ने ईश्वर की अपने ऊपर कृपा का वर्णन किया है और भक्तितन्मय हृदय से उसकी महिमा का गान किया है। यहाँ ईश्वर के स्तवन में बार बार पुनरुक्ति हुई है लेकिन प्रभु कीर्तन में पुनरुक्ति दोष नहीं मानना चाहिए।
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