न ईमाँ परस्ती न ओज़ाए दीं ।
न साहिब शनासी न मोहकम यकी ॥
न इसमें धर्म विश्वास के प्रति पूजाभाव है, न धर्माचार है। न मालिक, ईश्वर का ज्ञान है और न दृढ़ विश्वास है।
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