तु गाफ़िल मशौ जीं सिपज्जी सरा ।
कि आलम बिगुज़रद सरे जा बजा ॥
इस नाशवान सराय (रूपी दुनियाँ) से तू ग़ाफ़िल (प्रमत्त) मत हो क्योंकि जगत निरन्तर गुजरता जा रहा है।
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