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ज़फ़रनामा • अध्याय 1 • श्लोक 129
फ़रेदू कुजा बहमन इस्फ़न्दयार | न इन्क्रलाबे दारा दरामद शुमार ॥
फ़रेदू कहाँ है, बहमन और इस्फ़न्दयार कहाँ हैं, (समय के इस आवर्त में) दारा का उत्थान पतन किसी गिनती में नहीं आता।
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