व मैदाँ बिया खुद व तेगो तबर ।
म कुन खल्के खलाक जेरो जबर ॥
(तू) स्वयं तलवार कटार लेकर मैदान में आ। ईश्वर की (निर्दोष) सृष्टि को उथल पुथल मत कर।
यह चुनौती देने के बाद कहीं परमात्मा की दृष्टि में अविनय और अतिरेक न हो गया हो इसलिये गुरुजी परमात्मा की स्तुति करते हैं। इसमें हमें वैदिक ऋषि की भावना के दर्शन होते हैं जो शत्रु से लड़ता भी थ। तो परमात्मा को अपना न्याय कर्ता मानकर प्रार्थना में लीन हो जाता था "योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ।" (जो हमसे द्वेष करता है, जिसे हम द्वेष करते हैं उनको तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं - आपके सुपुर्द करते हैं।)
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