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ज़फ़रनामा • अध्याय 1 • श्लोक 135
उदु दृश्मनी गर हज़ार आवरद । न यक मूए ऊरा नज़ार आवरद ॥
शत्रु यदि हजार (तरह से) दुश्मनी करे तो भी उसका (ईश्वर की कृपा से युक्त व्यक्ति का) एक भी बाल कोई नहीं कमज़ोर कर सकता।
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