नविश्ता रसीदो बिशुफ़्ता ज़बां ।
बिशयद कि कारे व राहत रसां ॥
(तेरा) लिखा हुआ (पत्र) मिला और (पत्रवाहक दूत के द्वारा) ज़बानी कहा हुआ भी। उचित है कि काम (सबके लिये) सुख पहुँचाने वाला हो।
(इससे पता चलता है कि यह ज़फ़रनामा गुरुजी ने औरंगज़ेब के पत्र के उत्तर में और ज़बानी सन्देश के उत्तर में औरंगज़ेब को लिखा था।)
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