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अध्याय 14 — चतुर्दश अध्याय

शिवभारतम्
78 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोला - हैबतराजा के बलशाली पुत्र को युद्ध में मार दिया ऐसा सुनकर अभिमानी फत्तेखान शिवाजी पर क्रोधित हुआ।
तत्पश्चात् मुसेखान आदि बलवान् यवनों के द्वारा परिवेष्टित, मत्ताजी प्रमुख अनेक राजाओं द्वारा रक्षित एवं हाथी के समान मदमस्त सामन्त राजाओं द्वारा चारों ओर से घिरे हुए उस फत्तेखान ने शिवाजी को जीतने की इच्छा से तुरन्त प्रस्थान किया।
किसी ने चलते हुए मदमस्त हाथी के समूह को ही मगरमच्छ का समूह समझ लिया, किसी ने कूदते हुए चतुर एवं उन्नत घोड़ों को मछलियों का समूह समझ लिया, वायु से हिलने वाले ध्वजरूपी तरंगों से सुशोभित, किसी ने पृथ्वी से उठने वाली धूल के समूह को ही बादल से आच्छादित आकाश समझ लिया। किसी ने दुंदभी के ध्वनि को ही दिशा रुपी किनारों को प्रतिध्वनित करने वाली गर्जना समझ लिया, किसी ने सफेद छातों को ही झाग समूह समझकर उसके समूह से सफेद दिख रहा है ऐसा समझ लिया। किसी ने कठोर ढालों को कछुआ तो किसी ने प्रचण्ड धनुष को ही सांप समझ लिया शस्त्ररूपी वडवाग्नि से भयंकर सेनारूपी समुद्र को युद्ध के लिए साथ ले जाते समय आदिलशाह के सेनापति को पुरंदर का किला दिख गया।
अभिमानी फतेखान ने चालकी से जाने वाली उस बलवान सेना निवासस्थल, उस किले से थोड़ी ही दूर पर बना लिया।
उस शत्रु सेना को समीप आया हुआ देखकर, शाहजी के पुत्र ने किले के शिखर पर जाकर युद्ध की दुंदुभी बजा दी।
जैसे वायु से मानस सरोवर अचानक कंपित हो जाता है, उसी प्रकार उस दुंदुभी के ध्वनि से शत्रु के मन कंपित हो गये।
तत्पश्चात् समान गुणशाली, अहंकारी, प्रलयाग्नि के समान उत्कृष्ट तलवारों को धारण करने वाले युद्ध करने के लिए उत्सुक, प्रभावी शस्त्रों से सज्ज, गर्जना करने वाले, ऐसे मुसेखान आदि पराक्रमी एवं धैर्यवान् वीर सैनिकों को साथ लेकर वह अभिमानी फतेखान शीघ्र ही पुरंदर किले पर चढ़ने लगा।
बादलों को विदीर्ण करने वाली गर्जना को करती हुए वह प्रचंण्ड सेना जब किले पर चढ़ रही थी तो उसके पृष्ठभाग पर फतेखान, अग्रभाग पर मुसेखान, बायीं तरफ फलटण का राजा और दाएं तरफ घाटगे था।
जिन्होंने कभी भूमि पर पैर नहीं रखा एवं जो सदा वाहन से ही यात्रा करते थे, उनको भी उस समय किले पर अपने पैरों से ही चढ़ना पड़ा।
तत्पश्चात् चारों ओर से किले पर चढ़ने वाले शत्रुओं को देखकर शिवाजी के सेनाधिपति ने क्रोधित होकर सिंह के समान गर्जना की।
तोपों के मुंह से निकलने वाले प्रज्वलित लोहे गोलों से, बन्दूक की गोलियों से अनेक बड़े-बड़े शिलाओं से दारू के सैकड़ों बाणों से, गुलेल से घुमाये हुए अनेक पत्थरों से, शिवाजी के हजारों वीर सैनिकों ने शत्रु पर अत्यधिक प्रहार किया।
पर्वत से गिरी हुई जिन प्रचण्ड शिलाओं को शिवाजी के सैनिकों ने नीचे ढकेल दिया था, वे शिलाएं उन्नत स्थान से नीचे गिरते समय आपस में होने वाले भिडंत से तथा मार्ग में स्थित बड़ी शिलाओं के साथ घर्षण होने से उनसे धूल उड़ने लगी एवं तत्क्षण अग्नि की अत्यधिक चिंगारियां निकलने से उनके अनेक तुकड़े होकर वे सर्वत्र आकाश में उड़कर समीप आये हुई उस शत्रु की सेना पर जोर से गिरने लगी।
तोपों से निकलने वाले आकाशीय विद्युत् के समान भयंकर ज्वालाओं के लपटों जैसे, अनेक लोहों के गोलों से आदिलशाह के सेना के उन सैनिकों के तुकड़े होकर, पक्षियों की तरह आकाश में उड़कर बाज के पंक्तियों को तृप्त करने लगे।
भयंकर आवाज करते हुए आकाश से नीचे गिरने वाले समान लक्षणों से युक्त दारु के बाण मानो विषाग्नि की ज्वाला को मुंह से छोड़ने वाले सांप ही हो, ऐसी प्रतीति कराते हुए बाण गोल घुमकर आदिलशाह की सेना पर धड़ाधड गिरने लगे।
बंदूक से निकली हुई एक ही वेगवान् गोली अनेक यवनों को भेदकर उनको पृथ्वी पर गिराने लगी।
किले पर स्थित लोगों द्वारा छोड़े गये शिलाओं के द्वारा जिनके वक्षःस्थल चूर्ण हो गये हैं, ऐसे अनेक लोग मूच्छित होकर आधे मार्ग में गिर गए।
उस किले के तट पर पड़े हुए अनेक लोग बड़े-बड़े पत्थरों से भग्न हुए वे शिंदुर की तरह लाल रक्त की उल्टियां करने लगे, उनके साथियों द्वारा उठाकर ले जाए जाते हुए वे प्राणरक्षणार्थ फिर वापस लौटकर वेग से अपने शिविर की तरफ चले गये।
जिनके शरीर बंदूक की गोलियों से विदीर्ण हो गये हैं एवं पानी के फब्बारे की तरह उड़ने वाले रक्त की धारा से वे व्याप्त हो गये हैं, जिनके अंगों की एक जैसी पीड़ा हो रही है एवं जिनका स्वर अतिशय पतला हो गया है, ऐसे अनेक प्यासे लोग पानी-पानी करते हुए यमराज के आतिथ्य को प्राप्त करने के लिए चले गये।
शत्रु से अपनी सेना को पराजित हुआ देखकर मुसेखान अपने सजातीय श्रेष्ठ सैनिकों से बोला।
मुसेखान बोला - नीचे गिरने वाले बड़ी-बड़ी शिलाओं का गिरना मानो पग-पग पर उत्पात ही था, चारों ओर गिरने वाले ये अपने सेनापतियों को मार रहे हैं।
अहो! यह पुरंदर किले के स्वामी शिवाजी का बड़ा ही उत्कर्ष है कि जो स्वयं आक्रमण करके हम जैसे शूरों को पराजित कर रहा है।
जिनके तलवार के बहादुरी का यश लोक में प्रसिद्ध है, उनको इस स्थान से वापस लौटना अत्यन्त तिरस्कृत है।
पीछे पग मत बढ़ाओं, सामने के किले पर दृष्टि रखो। युद्ध में स्थित रहने वाले मनुष्य की विजय प्रायः त्याग नहीं करती है।
तत्पश्चात् इस प्रकार बोलते हुए ही वह महामना मुसेखान पीछे की ओर से लौटने वाले विशाल सेना एवं अपनी सेना से युक्त अशरफशहा, दोनों शेखों सहित मत्राजी राजा, उसी प्रकार फलटण का बलवान् राजा, फत्तेखान की सेना और अनेक सामंत राजाओं के साथ वेगपूर्वक पुरंदर किले की चढ़ाई चढ़ने लगा।
गर्जना करने वाले बड़े मेघों से युक्त, महामेघों की तरह चारों ओर से पुरंदर के तट पर चढ़ने वालों को क्रोधपूर्वक देखकर, तुरंत कल्याणकारी एवं अज्ञात गोद आदि अत्यन्त वेगवान् योद्धाओं ने शस्त्र उठाकर चारों दिशाओं में आक्रमण कर दिया।
मुसेखान आदि ने भी ग्रह जैसे बड़े ग्रह पर आक्रमण करता है। उसी प्रकार उस शत्रुसेना के योद्धाओं पर निर्भयता से आक्रमण कर दिया।
तब अशरफशाह से बलशाली सदोजी, क्रोधित मुसेखान से जगताप मिनाद एवं रतन से भैरव, बौर घाटगे के साथ शस्त्र चलाने में निपुण वाघ, ऐसे ये सब लडने लगे।
अत्यन्त अभिमानी, गदाधारी एवं विशाल सेना से युक्त काबुक ने, दूसरे अनेक सैनिकों के साथ अत्यधिक युद्ध किया।
युद्ध के लिए आवेशित, जुए की तरह लम्बे हाथ वाले, सिर पर उत्कृष्ट मुकुट को धारण करने वाले एवं कवच को शरीर पर धारण किए हुए, परस्पर विरोध करने वाले, दोनों सेनाओं के योद्धा, धनुष को हिलाते हुए एवं तीक्ष्ण बाणों से युक्त, सहन कर, सहन कर, इस प्रकार बार-बार गर्व से बोलते हुए, उस पुरंदर किले की चढ़ाई पर दोनों ने अद्भुत युद्ध किया।
उस समय पुरंदर की प्राप्ति के लिए परस्पर प्रहार करने वाली सेनाओं में से एक सेना तो नीचे उतर नहीं सकी और दूसरी सेना ऊपर नहीं चढ़ सकी।
परस्पर देखकर एवं निशाना साधकर एक सेना ने बाणों से पृथ्वी तल को और दूसरी सेना ने आकाश को ढक दिया।
जो बाण किसी की छाती को भेदकर दूसरे की भुजाओं को छिन्न करता था तो वही बाण तीसरे के मुकुट युक्त सिर को उड़ा देता था।
वहां पर अत्यन्त क्रोधित हुए गोदाजी ने वेग से समीप जाकर मुसेखान की छाती में तीक्ष्ण भाले को घुसा दिया।
किन्तु उस शत्रु के द्वारा अपने छाती में घुसाये हुए एवं कवच को भेदकर जाने वाले उस तीक्ष्ण एवं भयंकर भाले को, उस यवन ने दोनों हाथों से अपनी छाती से निकालकर, क्रोध से दांत एवं ओठों को चबाते हुए उसके दो टुकड़े कर दिए।
गहरी लाल मिट्टी से रंगी हुई चट्टान जैसे पर्वत को सुशोभित करती है, वैसे ही रक्तरंजित उसकी छाती उसको सुशोभित करने लगी।
इतने में ही ढाल एवं तलवार को धारण किया हुआ, धैर्यवान् सदाजी योद्धा अशरफशहा के साथ लड़ाई करने के लिए वेगपूर्वक चला गया।
दोनों ही युद्धकार्य में मदमस्त थे, दोनों के ही नेत्र रक्त की तरह लाल हो गये थे, दोनों ही शख्खों से सुसज्जित थे, दोनों का ही उत्साह महान् था और दोनों ही अपनी-अपनी तलवार को बार-बार घुमाकर आकाशीय विद्युत् की चमक की तरह आकाश को प्रकाशित कर रहे थे, दोनों ही परस्पर की गलतियों को ढूंढते हुए, सिंह जैसी गर्जना कर रहे थे, भ्रान्त, उद्‌द्घान्त आदि पट्टे के प्रकाश दिखाते हुए वे सुशोभित हो रहे थे।
तत्पश्चात्, परस्पर किए गए तलवार के प्रहारों से दोनों के शरीर चोटिल होकर क्षणभर में ही रक्तरंजित हो गये।
इधर वाघराजा ने भयंकर शक्ति को धारण करने वाले, पुरुषों में श्रेष्ठ, घाटगे राजा की खम्भे जैसी भुजा पर अत्यन्त तीक्ष्ण शक्ति से शीघ्र प्रहार किया।
तब शरीर से बहने वाले रक्त से रंजित हुए उस युद्ध निपुण घाटगे ने भी शक्ति से उसकी भुजा पर जोर से प्रहार किया।
तब दूसरे शेर के समान उस वाघ राजा ने घाटगे के प्रहारों को सहन करते हुए अपने पराक्रम को दिखाकर अपने लोगों को हर्षित किया।
मिनाद एवं रतन ने भी धनुष को कान तक खींचकर समीप आये हुए भैरव चोर नामक राजा को बाण से ढक दिया।
उन दोनों के द्वारा छोड़े गए बाणों से विदीर्ण किया गया, उसका शरीर छलनी की तरह दिखने लगा।
यह अकेला और दोनों होते हुए भी वहां पर बहुत समय तक युद्ध चला तथापि अन्त में भैरव चोर को ही विजयश्री प्राप्त हुई।
क्रोधित एवं अग्नि की तरह तेजस्वी काबुक ने भी जोर के गदा प्रहारों से सैंकड़ों शत्रुओं को सुला दिया था।
जिनके उत्कृष्ट कवच भग्न हो गये हैं एवं छाती विदीर्ण हो गई है, जिनके अचानक मूर्च्छित होने से हाथों से शस्त्र गिर गये हैं, जिनके प्रत्येक अवयवों से बहने वाले रक्त से भूमि रंजित हो गई है, ऐसी रणभूमि पर गिरने वाले लोग सुशोभित होने लगे।
बहने वाले रक्त से रंजित शरीर वाले वे उत्कृष्ट वीर झरने के प्रवाह में मिश्रित लालमिट्टी से रंगे हुए पर्वत के समान सुशोभित होने लगे।
वीरश्री से सुशोभित वीर शिवाजी भी वहां पर उसके एवं शत्रु के बीच में चलायमान उस युद्ध के कौतूहल को उस समय वह प्रत्यक्ष देख रहा था।
उस समय पुरंदर किले के तट से गर्जना करती हुई रक्त की महानदी अत्यन्त अभिमान के साथ उन्मुक्त एवं आवाज करती हुई प्रवाहित होने लगी।
विमान में बैठकर अन्तरिक्ष को प्रकाशित करने वाले सभी देव, उस महायुद्ध को बार-बार देखकर, उसकी प्रशंसा करने लगे।
उस समय धारण की हुई भयंकर मस्तकों की माला से मनोहर दिखने वाला शंकर प्रसन्न होकर प्रेमियों के साथ वहां आ गए।
अतिशय भूखे राक्षस उस समय आनन्दित होकर अत्यधिक मांस के मिलने के कारण से संतुष्ट हो गये।
उस समय भूखे पिशाच रक्त से परिपूर्ण मस्तकों को निर्भयता से गोद में रखकर वेग से खाने लगे।
उस समय भयंकर छलांग लगाने में निपुण ऐसी डाकिनीयों के साथ शाकनियों ने भी सैनिकों के मांस से अपने शरीर को पुष्ट किया।
कवीन्द्र बोला - हे ब्राह्मणों! उस समय गोदाजी ने मुसेखान को किस प्रकार मारा था, ये सभी अब मैं बताता हूं, तो आप सुनो।
बलवान् मुसेखान ने जब भाला भग्न किया तो क्रोधित होकर उसने काले कौवे के पेट की तरह आकृति वाली तलवार हाथ में ले ली।
उस स्थान पर उस आकाशीय विद्युत् की तरह आकृति से युक्त तलवार से सैकड़ों पठानों के टुकड़े होकर भूमि पर गिर गये।
किन्तु मुसेखान ने उसके अमानवीय कृत्य को देखकर उसकी बायी भुजा पर अपने तलवार से प्रहार किया।
वेगवान् मुसेखान द्वारा बायीं भुजा पर प्रहार करने से भी वह महावीर, जैसे वायु से वनवृक्ष कम्पित नहीं होता है, वैसे ही वह कम्पित नहीं हुआ।
भौहों को चढ़ाकर एवं अत्यन्त क्रोध से क्रूर दृष्टि वाले वे दोनों ही हाथों में भयंकर तलवारों को लेकर कभी आगे तो कभी पीछे हट रहे थे, हाथी के समान गर्जना करते हुए जब आपस में प्रहार कर रहे थे तो उनके मुकुट एवं कवच विदीर्ण होकर दोनों सुशोभित होने लगे।
तत्पश्चात् परस्पर किए गए शस्त्रों के प्रहारों से चोटिल हुए वे दोनों अचानक रक्त की धारा से पृथ्वी को अभिसिंचित करने लगे।
अहो! वहां पर उन दोनों में क्षणमात्र समान युद्ध हुआ, फिर उस युद्ध से होने वाली वेदना को सहन करते हुए गोदाजी, मुसेखान पर भारी पड़ गए।
फिर अनेक प्रहारों से अत्यन्त घायल हुए उस बलवान् मुसेखान ने गोदाजी के मस्तक पर प्रहार किया।
जब तक इसकी तलवार गोदाजी के सिर पर गिरती, तब तक गोदाजी ने अपने तलवार से उस शत्रु को मार दिया।
उस समय उस क्रोधित गोदाजी के प्रहार से वह मुसेखान, कंधे से मध्यभाग तक कटकर उसके दो टुकड़े हो गये।
तब दो भागों में विभक्त हुए उसके शरीर को नीचे गिरा दिया और तब उसके रक्तप्रवाह से पृथ्वीतल लाल हो गया।
गोदाजी जगताप द्वारा मुसेखान को मार दिए जाने पर, वहां सैकड़ों यवन यमराज के अतिथि हो गए।
तलवारधारी सदाजी के साथ तलवार युद्ध करने में असमर्थ शत्रुओं ने पीछे हटकर अभिमान से उत्तम धनुषों को उठाया।
तत्पश्चात् तीक्ष्ण बाणों से विदीर्ण करने वाले अशरफशाह ने अनेक रंगों से रंजित, इंद्रधनुष की तरह लंबे, धनुष की प्रत्यंचा को खींचकर झुकाया तो तलवारधारी सदाजी ने पास जाकर उसको काट दिया।
निपुण हाथों से शत्रु द्वारा दो टुकड़े किए गए, रंग-बिरंगे बिंदियों की पंक्ति से सुशोभित, युद्ध के मित्र, ऐसे उस धनुष को उस समय छोड़कर, उस शत्रु को मारने के लिए उसने लोहे का सोटा उठाया।
शरीर से सिंह की तरह एवं अतिशय सावधानी पूर्वक युद्ध करने वाले उस सदोजी ने, उसके शख को लेते ही तोड़ दिया।
वहां पर उस यवन ने जो-जो शस्त्र अपने हाथों में लिए उन-उनको सदोजी ने उसी समय तोड़ दिया।
तत्पश्चात् निःशस्त्र होकर मुंह घुमाकर वह यवन स्वेच्छा से इधर-उधर पलायन करने लगा।
तत्पश्चात् घाटगे भी उस शत्रु योद्धा वाघ के साथ बहुत देर तक युद्ध करके जैसे एक हाथी के पास से दूसरा हाथी भाग जाता है, वैसे ही उसके पास से वह भाग गया।
निनाद एवं रतनु भी भैरव को वास्तविक कालभैरव समझकर प्रलयकाल की तरह उस युद्ध से निकल गये।
पुरंदर से रक्षा हेतु वापस लौटने वाली उस सेना को खिन्न फत्तेखान ने घूमकर नहीं देखा।
वहां अनेक सैनिकों के साथ सामने आये हुए उस फतेखान को, उस शहाजी के पुत्र शिवाजी ने बल से भग्न करके, भाग्य के कारण अप्रतिहत गत्तिवाला एवं उदयमान पराक्रमी वह शिवाजी विजापूर के सुलतान को जीतने के लिए उत्साही हुआ।
शक्ति से युद्ध करने के बाद भी शिवाजी से पराजय को प्राप्त करके खिन्न हुआ, फतेखान विजापूर पहुंच गया और वह समाचार दरबार में अचानक सुनकर महमूदशाह दुःखी हो गया और बहुत दिनों तक चिन्ता के सागर में डूब गया।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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