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शिवभारतम् • अध्याय 14 • श्लोक 11
प्रज्वलद्भिरयः पिण्डेर्नालायंत्रास्य निः सुतैः । नलिका गुळिकाभिश्च गण्डशैलैरनेकशः ॥ उल्कावाणैव शतशो भिन्दिपालैश्च भूरिशः । परानवाकिरन् भूरि शिवशूरास्सहस्रशः ॥
तोपों के मुंह से निकलने वाले प्रज्वलित लोहे गोलों से, बन्दूक की गोलियों से अनेक बड़े-बड़े शिलाओं से दारू के सैकड़ों बाणों से, गुलेल से घुमाये हुए अनेक पत्थरों से, शिवाजी के हजारों वीर सैनिकों ने शत्रु पर अत्यधिक प्रहार किया।
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