किसी ने चलते हुए मदमस्त हाथी के समूह को ही मगरमच्छ का समूह समझ लिया, किसी ने कूदते हुए चतुर एवं उन्नत घोड़ों को मछलियों का समूह समझ लिया, वायु से हिलने वाले ध्वजरूपी तरंगों से सुशोभित, किसी ने पृथ्वी से उठने वाली धूल के समूह को ही बादल से आच्छादित आकाश समझ लिया। किसी ने दुंदभी के ध्वनि को ही दिशा रुपी किनारों को प्रतिध्वनित करने वाली गर्जना समझ लिया, किसी ने सफेद छातों को ही झाग समूह समझकर उसके समूह से सफेद दिख रहा है ऐसा समझ लिया। किसी ने कठोर ढालों को कछुआ तो किसी ने प्रचण्ड धनुष को ही सांप समझ लिया शस्त्ररूपी वडवाग्नि से भयंकर सेनारूपी समुद्र को युद्ध के लिए साथ ले जाते समय आदिलशाह के सेनापति को पुरंदर का किला दिख गया।
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