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शिवभारतम् • अध्याय 14 • श्लोक 32
यः कस्यचिदुरो भित्वा भुजं चिच्छेद कस्यचित् । स एवेपुस्सशीर्षण्यमन्यदीयं शिरो हरत् ॥
जो बाण किसी की छाती को भेदकर दूसरे की भुजाओं को छिन्न करता था तो वही बाण तीसरे के मुकुट युक्त सिर को उड़ा देता था।
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