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शिवभारतम् • अध्याय 14 • श्लोक 34
निशातं विद्विषा तेन निखातं निजवक्षसि । यवनस्स तु तं भल्लं भीमं सन्नाहभेदिनम् ॥ उभाभ्यामपि पाणिभ्यामुद्धृत्य स्वभुजान्तरात् । रोषदष्टाधरतलः सद्य एव द्विधा व्यधात् ॥
किन्तु उस शत्रु के द्वारा अपने छाती में घुसाये हुए एवं कवच को भेदकर जाने वाले उस तीक्ष्ण एवं भयंकर भाले को, उस यवन ने दोनों हाथों से अपनी छाती से निकालकर, क्रोध से दांत एवं ओठों को चबाते हुए उसके दो टुकड़े कर दिए।
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