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शिवभारतम् • अध्याय 14 • श्लोक 17
गिरेस्तस्य तटे लग्नाः केऽपि भग्ना महाश्मभिः । वमन्तो लोहितं भूरि रक्तवालुकलो हितम् ॥ समुद्यानुप्लवैरुह्यमानाः प्राणावनार्थिनः । परावृत्य स्यादात्मशिविराय प्रतस्थिरे ॥
उस किले के तट पर पड़े हुए अनेक लोग बड़े-बड़े पत्थरों से भग्न हुए वे शिंदुर की तरह लाल रक्त की उल्टियां करने लगे, उनके साथियों द्वारा उठाकर ले जाए जाते हुए वे प्राणरक्षणार्थ फिर वापस लौटकर वेग से अपने शिविर की तरफ चले गये।
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