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शिवभारतम् • अध्याय 14 • श्लोक 46
विशीर्णवरवर्माणो विदीर्णतरवक्षसः । सहसा परिमुह्यन्तो हस्तविस्तप्रस्तहेतयः ।। प्रतिप्रतीकनिर्गच्छद्रक्तरञ्जितभूमयः । आयोधनाजिरेऽमुष्मिन्निपतन्तो विरेजिरे ।।
जिनके उत्कृष्ट कवच भग्न हो गये हैं एवं छाती विदीर्ण हो गई है, जिनके अचानक मूर्च्छित होने से हाथों से शस्त्र गिर गये हैं, जिनके प्रत्येक अवयवों से बहने वाले रक्त से भूमि रंजित हो गई है, ऐसी रणभूमि पर गिरने वाले लोग सुशोभित होने लगे।
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